चाबी _ Chapter 3

 रात के 4:15 बजे रणवीर को सपने में कोई बोलता हुआ सुनाई देता हैं: "बेटे, कल तेरे सच्चाई के रास्ते पर चलने की अग्निपरीक्षा हैं। मैंने जो तुझे शिक्षा दी थी उसे भूलना मत। गलत रस्ते पे मत निकल जाना, मेरे बेटे!" सपने में उसे अपनी प्यारी प्यारी मां दिखाई देती हैं, जवान जैसे वो 30 साल की उम्र में दिखती थी वैसी। बालों में उसने रातरानी के सफेद फूल डाले हुवे हैं। उसका गोरा रंग अंधेरे में रखे हुवे दीपक की भांति चमक रहा हैं। उसके सुंदर नैन जैसे उसको एकदम छोटा 2 साल का बालक बनने को, उसकी गोद में खेलने को मजबूर कर रहे। चाहे वो सपना ही क्यों न हो, लेकिन बहुत ही मनभावन, मन को लुभाने वाला सपना हैं!!

"कौन हैं? कौन हैं? मां? तुम? तुम कहां चली गई हो? मैं तुम्हारे बिन, देखो ना, कितना अकेला हो गया हूं, मेरी मां! वापस लौट आओ ना मां! क्या तुम वापस नहीं आ सकती मेरे पास, अपने अकेले बेटे के पास? कहीं ऐसा न हो कि तेरा ये बेटा तेरी जुदाई के ग़म में, इस संसार की उधेड़ बुन को सुलझाने में, कहीं सही रस्ते से भटक ना जाए, कोई गलत रास्ता इख्तियार न कर ले...मुझे रास्ता दिखाओ मां...!" : वो सपने ने अपनी मां से बातें करने लगता हैं। 

"मुझे विश्वास हैं बेटे की तू गलत रास्ते पर नहीं जायेगा। तुझे जो संस्कार मैने दिए हैं उनको तू जीवन में उतारेगा।खुश रहे बेटा,.. अब मेरा तेरी दुनिया में वापस आना संभव नहीं हैं। क्योंकि मैं अब दूसरी दुनिया में जा चुकी हूं। पर याद रख मेरे बेटे, मैं हमेशा तेरे साथ हूं। तू अपने आप को कभी भी अकेला मत समझना। तू जहां जहां चलेगा, मेरा साया साथ होगा...अब मैं जाती हूं, घबराना मत, मैं तुम्हे फिर मिलूंगी...आती रहूंगी यूं ही तेरे सपने में...खुश रहे, मेरे बेटे...": मां बोली।

"मत जाओ मां, मुझे अकेला छोड़ के मत जाओ... मां... मां... मां........" वो आखिरी तीन शब्द वो जोर से बोलता हैं। इतना जोर से की खुद जाग जाता हैं। देखता हैं तो पत्नी और बच्चे तो अभी भी गहरी नींद में सो रहे हैं। उस सपने ने मां ने जो बात कही थी, सच्चाई के रास्ते से कभी न फिसलने की, वो उसे फिर अपने आप दोहराता हैं। "कुछ भी जो जाए, मैं रणवीर विजय भट्ट, सच्चाई के रास्ते से कभी भी मुंह नहीं फिराऊंगा। अधर्म के रास्ते पर एक कदम भी नहीं रखूंगा। ये मेरा वादा हैं, मेरी मां...": मन ही मन वो अपनी मां को वचन देता हैं और फिर से सो जाता हैं। 

अगले दिन सुबह 7 बजे, अलार्म के बजते ही वो उठ खड़ा हो जाता हैं। बच्चे कब के स्कूल जा चुके हैं और घरवाली अपने काम में रसोईघर में व्यस्त हो चुकी हैं। दो घड़ी शंकर दादा, कृष्ण और हनुमान को याद कर के, ईश्वर स्मरण कर के रणवीर सीधा बाथरूम में चला जाता हैं। सुबह की दैनिक क्रियाएं और नाश्ता खत्म कर के, वो 7:53 को घर से निकल जाता हैं। 8:08 को वो रोशन चायवाले की दुकान पर, रोज की तरह आ जाता हैं। 

अचानक उसे सुखबीर याद आता हैं। वो ठीक हुआ कि अभी भी बीमार पड़ा हैं, कल के छोटे से एक्सीडेंट के बाद? चलो उसके घर एक बार हो के आता हूं। उसे अच्छा लगेगा। तुरंत वो  बाइक को किक लगा के सुखबीर के घर पहुंचता हैं। 

उसकी बहन दरवाजा खोलती हैं। "सत श्री अकाल, रणवीर भैया!" : वो बोलती हैं।

"सत श्री अकाल, बहन! अब कैसी तबियत हैं सुखी की..?": रणवीर

"बढ़िया हैं जी...कल रात को ठीक खाना भी खाया और अब तो थोड़ा थोड़ा चलने फिरने भी लगे हैं। डॉक्टर ने बोला हैं दो दिन आराम करेगा तो उसके बाद वो बिलकुल स्वस्थ हो जाएगा। हाथों के जो घांव हैं वो अब धीरे धीरे ठीक हो रहे हैं जी!": बहन

अभी इतनी बात हुई की सुखबीर आहिस्ता आहिस्ता चलते हुवे अंदर वाले कमरे से बाहर आ गया। उसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी। आ के सीधा वो रणवीर के गले लग गया। "ओ पापे, अगर तू ना होता तो न जाने कल मेरा क्या हाल होता! ओए Thank you, रणवीरे...! दिल से थैंक यू जी!!"🙂🙂 इतना कह कर वो एक बार फिर रणवीर को गले लगा लेता हैं। 

"इसमें इतना कोई अहसान नहीं किया जी मैंने तेरे पर....जो किया वो मेरा फ़र्ज़ था, एक दोस्त के नाते, एक इंसान के नाते...": रणवीर

"अरे पूनम दो कॉफी बना दे फटाफट हम दोनों के लिए..": सुखबीर ने बहन पूनम को दो कॉफी बनाने को बोल दिया।

"जी भैया...10 मिनट लगेगी...!": पूनम

फिर दोनों दोस्त टीवी पे समाचार देखने लगे। आजतक चैनल पर मुंबई में हुई चोरी के बारे में  समाचार आ रहा था। 

"न जाने क्यों लोग चोरियां करते हैं? कितना पाप हैं इसमें..किसी की चीजें चुपचाप उठा लेना...": रणवीर

"ओए, ये पाप बाप कुछ नहीं होता, दुनिया में। अगर मुझे मौका मिले तो मैं भी नहीं इतराऊंगा..  चोरी करने से अगर लाखों का माल हाथ में आ जाता हैं तो मैं तो ले ही लूंगा वो माल... हा हा हा हा...😀...": सुखबीर

"मैं तो कभी नहीं लूंगा, चोरी का माल...फिर चाहे वो एक हजार का हो, चाहे एक करोड़ का...मेरी मां ने जो सिखाया हैं वो ही करूंगा मैं...कुछ भी हो जाए चोरी नहीं करूंगा..." : रणवीर

"बोलना बहुत आसान हैं, दोस्त। उसे हकीकत में कर के दिखाना मुश्किल होता हैं। खुला पैसा और खुली औरत को कोई मर्द आजतक यूं ही छोड़ पाया हैं क्या?": सुखबीर

"सुखबीर तू खुद के घर में बैठे बैठे ऐसी गंदी बात क्यों कर रहा हैं, मेरे दोस्त? चोरी चाहे एक पैसे की हो, या एक करोड़ की, चोरी "चोरी" ही होती। ये एक जुर्म हैं, एक पाप हैं...": रणवीर

"तुझे अभी तक तेरे सामने अचानक यूं ही पड़ा हुआ ढेर सारा पैसा नहीं मिला ना, इसलिए बेटे, तू ऐसी सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र जैसी बातें कर रहा हैं। जिस दिन तेरे लिए ऐसी नौबत आएगी, तब तू भी वो सब उसूलों वाली बातें छोड़ के, माल ले कर फरार हो जाएगा... हा हा हा हा...बिल्कुल मेरी तरह... हा हा हा हा हा.. अब वो सब छोड़..मैं आज ही से काम पे लगने की सोच रहा हूं..तेरे साथ....क्योंकि घर बैठे बैठे बोर हो जाऊंगा यार...": सुखबीर

"पहली बात तो ये कि मैं किसी भी किम्मत पर चोरी का काम नहीं करूंगा। दूसरी बात, हां अगर तेरा मन बाहर निकलने को कर रहा हैं, तो कोई बात नहीं। आजा मेरे साथ..आज दोनों एक साथ डिलीवरी करते हैं...": रणवीर

"हां...बाइक मेरी ले लेते हैं। तू चला लेना। डिलीवरी देने मैं जाऊंगा अंदर तक...तू बाइक पर बैठे रहना...जो मिला उसे 75:25 बांट लेंगे। 25% मेरा, 75% तेरा...": सुखबीर

रणवीर: "अरे नहीं यार, कोई बात नहीं...50:50 कर लेंगे...आधा आधा कर लेंगे...तू थोड़ा इंजर्ड हैं (इजाग्रस्त हैं) तो क्या हुआ, साथ में तो होगा...इसलिए जो भी मिलेगा उसमें से आधा तेरा, आधा मेरा..."

सुखबीर: "ठीक हैं दोस्त! जैसा तू बोले..."

कॉफी पी कर दोनों सुखबीर के घर से डिलेवरीया देने के हेतु से बहार आ जाते हैं। रणवीर सुखबीर की नई स्प्लेंडर बाइक चला लेता हैं और सुखबीर पीछे बैठ जाता हैं। दोनों कुछ देर बाद 9:27 को उनके निर्धारित हॉटस्पॉट नायगांव रेलवे स्टेशन आ जाते हैं। 

पहला ऑर्डर मीरा रोड का उन्हें 9:45 को मिलता हैं। अकबर मसूद नाम के एक आदमी ने कुछ क्रॉकरी खरीदी हैं। वो दोनों हिफाजत से उस सामान को Blinkit के नायगांव स्टोर से उठा कर, डिलीवरी देने हेतु मीरा रोड तक चले जाते हैं। समय की मर्यादा में वो अकबर भाई को डिलीवरी कर के फिर से अपने हॉटस्पॉट नायगांव रेलवे स्टेशन आ जाते हैं। कमीशन अच्छा मिला हैं उस पहले ऑर्डर से इसलिए दोनों खुश हैं। 

दूसरा ऑर्डर निकलता हैं 10:53 को। बोरीवली वेस्ट से अनुपम खरगे का ऑर्डर हैं। उन्होंने कुछ सब्जियां और सेब मंगवाए हैं। दोनों निकल पड़ते हैं डिलीवरी करने के लिए। रास्ता काफी लंबा हैं नायगांव स्टेशन से बोरीवली वेस्ट तक का करीब 31 किलोमीटर। यानि हाईवे से जायेंगे तो कमसे कम 80 मिनट लगेंगे। दोनों निकल पड़ते हैं। 

अचानक रास्ते में रणवीर को याद आता हैं कि कल कश्यप श्रीवास्तव के नए ताले की चाबी उसके पास रह गई थी। वो पूरी कहानी सुखबीर को बाइक चलाते चलाते सुना देता हैं। जैसे ही ये कहानी सुखबीर सुनता हैं, वो बोल पड़ता हैं, "क्या बात हैं, क्या बात हैं...!" ये कहकर उसे दो मिनट के लिए हाईवे पर आए ढाबे पर रुकने को बोलता हैं, ये कह कर कि उसके शातिर दिमाग में एक प्लान आया हैं, ऐसा प्लान जो कि दोनों की जिंदगियां बदल सकता हैं। रणवीर को देरी हो रही हैं इसलिए वो सुखबीर को समझा देता हैं कि वो अनुपम खरगे के ऑर्डर की डिलीवरी पूरी कर के, उसकी सारी बातें, सारा प्लान सुनेगा। 

अनुपम खरगे के घर दोनों 12:10 को ही पहुंच जाते हैं, दिए गए समय से 8 मिनट जल्दी। उसकी डिलीवरी पूरी करने पर उन्हें अच्छा कमीशन आज दूसरी बार मिलता हैं। फिर एक रेस्टोरेंट में वो सुखबीर का प्लान सुनने घुसते हैं। 

वहां पर रणवीर की नजर मनीषा पर पड़ती हैं, जो कि कॉलेज के वक्त उसके साथ पढ़ती थी। दोनों इश्क में पागल थे। पर अब वो थोड़ी मोटी हो चुकी हैं और साथ में 3 बच्चे भी हैं। रणवीर वहां से ध्यान हटा कर सुखबीर की ओर घूम जाता हैं। दोनों उस रेस्टोरेंट के बाए वाली रो में सब से आखिरी टेबल के पास जो दो कुर्सियां हैं उसमें आमने सामने बैठे हुवे हैं। सुखबीर ने ये जगह बैठने को इसलिए तय की हैं क्योंकि उसे कुछ बहुत ही ख़ुफ़िया बातें अपने परम मित्र रणवीर को बतानी हैं। 

"अरे तू भी कमाल का आदमी हैं। एकदम कोने में ले आया तू मुझे...!? चल बीच में जा के बैठते हैं ना...उठ यहां से..." : रणवीर

"नहीं...ये जगह ही ठीक हैं। तुझे मालूम हैं ना वो कहावत "दीवारों के भी कान होते हैं!" इसलिए सबसे दूर ले आया हूं तुझे...इधर इस कोने में, हमारी बात किसी को मालूम नहीं होने वाली...": सुखबीर

"अच्छा? ऐसी कौन सी बात हैं? जरा हम भी तो सुने, जनाब!!": रणवीर

"हां तो अब जो बोलूंगा उससे तेरी और मेरी जिंदगियां बदल जाएगी...ये रोज़ रोज़ की भागदौड़, कल मेरा हुआ ऐसा एक्सीडेंट का रोज़ का खतरा, रोज़ सिर्फ 4 घंटे की नींद..इन सब से अगर तुझे छुटकारा पाना हैं तो तू मेरी बात ध्यान से सुनना...": सुखबीर

"छुटकारा तो मुझे भी चाहिए इस भागमभाग से.. सिर्फ 4 घंटे नींद वाली बेकार लाइफ से...लेकिन मजबूर हूं इस जॉब को करने के लिए...फिर भी चल तू बता तो सही क्या रास्ता सोचा हैं तूने यार??": रणवीर

"हां तब ध्यान से सुन...तूने जो नाम बताया ना, उस बंदे का जिसने नया ताला मंगवाया था Blinkit से और फिर उसकी एक चाबी तेरे पास रह गई? वो चाबी वास्तव में एक बड़ी तिजोरी की चाबी हैं...": सुखबीर

"वो कैसे?": रणवीर

"उस चाबी से हम उसके घर से काफी सारा माल निकाल सकते हैं, डुप्लिकेट चाबी बना के। मैं उस बंदे को सालों से पहचानता हूं। बहुत ही अमीर आदमी हैं। अगर उसकी गैर हाजरी में हम उसकी तिजोरी तक पहुंच गए तो रातों रात करोड़ों के मालिक बन जायेंगे, समझा की नहीं? उसमें सोना चांदी, हीरे, ज़ेवरात इत्यादि मिला के करोड़ों का माल पड़ा होगा। आधा तेरा आधा मेरा...अब फटाफट इस चाबी की डुप्लीकेट बना के उसे किसी सज्जन श्रीमान की तरह ओरिजनल वापस कर देते हैं, जिससे आगे जा के कोई कानूनी जमेला हम दोनों के लिए खड़ा ही ना हो...": सुखबीर

"ये तू क्या कह रहा हैं, सुखबीर? किसी के घर में चोरी करने को बोल रहा हैं? हम लोग चोर हैं क्या? दोनों ऊंचे खानदान से हैं। हैं की नहीं? मैं इस अधर्म के काम में तेरा साथ नहीं देने वाला...बिलकुल ही नहीं...": रणवीर

"ज़रा सोच...अगर तेरे हाथ रातों रात करोड़ों की दौलत आ गई, तो तू ये रोज़ के झंझटों से मुक्त हो जाएगा। तुझे सोचने के लिए वक्त चाहिए? तो देता हूँ ना..एक दिन, दो दिन, दस दिन, कितना वक्त चाहिए तुझे?": सुखबीर

"मुझे इस बारे में सोचने के लिए कोई वक्त की आवश्यकता ही नहीं हैं। मैने तय कर लिया हैं। मैं ऐसा गंदा काम नहीं करूंगा। और तू भी मत कर साले...खुद तो जेल जाएगा लेकिन तेरे पीछे तेरा परिवार बदनाम होगा, बर्बाद होगा वो तो अलग...कुछ सोच अक्ल के दुश्मन! सोच ज़रा!!: रणवीर

"अबे धर्म गया भाड़ में...अगर पैसा हैं तो सब कुछ हैं...मुझे बादशाहों की तरह जीना हैं अब से..तंग आ गया हूं मैं इस बेकार थर्ड क्लास नौकरी से..." इतना बोल के सुखबीर, आहिस्ता से रणवीर का पीला डिलीवरी बैग ले लेता हैं और उसमें से वो चाबी निकालने की कोशिश करने लगता हैं।

अभी वो ढूंढ रहा हैं लेकिन मिल नहीं रही। रणवीर उससे अपनी वो बैग वापस छीन लेने की कोशिश करता हैं। दोनों में हाथापाई हो जाती हैं।आखिरकार बैग फिर से रणवीर के कब्जे में आ जाती हैं। वो गुस्से से बोलता हैं: "देख सुखबीर, तू एक अच्छा दोस्त रहा हैं इसलिए मैं इस वक्त तुझे ज्यादा और कुछ नहीं बोल रहा..तू इस बात को यहीं पे खत्म कर..इस चाबी को भूल जा...समझा की नहीं?"

सुखबीर अभी भी गुस्से में हैं। वो वहां दूसरी मेज़ पर पड़े हुवे चाकू की तरफ देखता हैं। सोचता हैं कि अगर मैंने इसे चाकू मार दिया तो ये बैग तो मेरे हाथ आ जाएगी पर चाबी भी। लेकिन फिर ये ज़ख्मी हो जाएगा या मर जाएगा तो फिर पुलिस मेरे पीछे कुत्ते की तरह पड़ जाएगी। बेहतर हैं कि मैं कोई नाटक कर के वो चाबी खिसका लेता हूं। "हा हा हा हा...आ गया ना तू भी मेरी एक्टिंग के बहकावे में?😃": सुखबीर

"एक्टिंग थी क्या ये तेरी? तो तू सच में चोरी का कोई प्लान नहीं बना रहा हैं ना?": रणवीर

"अरे नहीं यार...😀😀...बिल्कुल नहीं..वाहे गुरु जी का खालसा वाहे गुरु जी की फतेह...मैं क्यों चोरी करने लगा भाई? हर इतवार को जो बंदा गुरुद्वारा जाता हो, वो ऐसे नीच काम थोड़े ही करेगा? ये तो मैं तेरा इम्तहान ले रहा था..तेरा....समझा रणवीर...? अब आजा गले लग जा एक बार..." ऐसा बोल के वो रणवीर के एकदम नजदीक आ कर उसके गले लग जाता हैं। Blinkit का पीला थैला अभी भी रणवीर के बाजू में पड़ा हैं। वो एक शातिर चोर की भांति उस थैले के दाई ओर आए खाने को खोल के उसके अंदर हाथ डालता हैं। उसमें से उसे चाबी नहीं मिलती तो वो अभी भी रणवीर को चिपके रहता हैं और अब बाई ओर के खाने से चाबी को ढूंढने लगता हैं। 

रणवीर: "अब बस भी कर सुखबीर! कितना चिपकेगा? कितनी देर तक चिपकेगा तू मुझे?" रणवीर को अब तक पता नहीं चला हैं सुखबीर के इरादे के बारे में। 

"अरे यार, आज ये जो मारा मारी हुई न हम दोनों के बीच, तो अब अचानक बहुत प्यार उमड़ रहा हैं इस सिख के सीने से...इसलिए अब भी गले लगा के रखा हूं तुझे ओ पापे....": ये बोलते बोलते सुखबीर बाई ओर के खाने से वो चाबी ढूंढ लेता हैं और फटाक से उठ के जोरों से खांसने लगता हैं। रणवीर को लगता हैं कि सुखबीर को पानी की जरूरत हैं इसलिए वो वहां से उठ के अंदर रखे हुवे दूसरे मेज के ऊपर रखे हुवे jug से पानी लेने को 10 कदम अंदर जाता हैं। उतने में सुखबीर वो चाबी बड़ी सफाई से अपनी पतलून की बाएं वाली वाली जेब में रख देता हैं। 

"तुमसे जो ये शरारत की वो मुझे ही भारी पड़ी यार! तेरा हाथ बहुत भारी हैं। तेरा एक मुक्का मुझे इधर गाल पे ऐसा लगा हैं की अभी तक दर्द हो रहा हैं...!" सुखबीर का नाटक अभी भी जारी हैं! 

"अरे, सॉरी यार...! वेरी सॉरी!...😃...अब जब हाथापाई करनी ही थी तुझे, तो मैं क्यों पीछे हटने लगा भाई मेरे? अगर तू सिख हैं तो हम भी कम नहीं हैं...हम भी गुजरात के असली ब्राह्मण भट्ट हैं...परशुराम भगवान का अंश हैं हम...अधर्म और अनिष्ट को होने नहीं देंगे, कैसे भी! ये तो अच्छा हुआ की तू सिर्फ मज़ाक कर रहा था। अगर असल में ये सब तू करता तो, मां भवानी की सौगंध, तुझे गिरेबान से उठा के जेल तक मैं ही पहुंचा देता, एक बार सबूत हाथ आ जाए उसके बाद...": रणवीर

"ऐसा क्या? सबूत तो तेरे पास कभी भी नहीं आएगा, बेटे..." सुखबीर फिर से कातिल नजरों से रणवीर को देखने लगा। "सबूत तब आएगा ना जब मैं कोई उल्टा सीधा काम करने की सोचूंगा। तेरा हाथ बहुत भारी हैं बाप! इसलिए अब मैं कोई उल्टा सीधा काम करूंगा ही नहीं, फिर सबूत की बात ही कहा आती हैं पापे?😀😀" ये बोलते बोलते सुखबीर हसने लगा। उसे हंसता हुआ देख कर रणवीर भी अब हंसने लगा। थोड़ी देर में दोनों उस मुठभेड़ को भी भूल गए जो दोनों के दरमियान कुछ मिनटों के पहले ही हुई थी। थोड़ा खाना खा के दोनों वहां से निकल गए। 

उस रेस्टोरेंट से बहार आते ही अचानक सुखबीर फिर से जोरों से खांसने लगता हैं। रणवीर का इरादा तब तक तो वो चाबी, जो उसके हिसाब से उसी के बैग में पड़ी हुई हैं, वो उसके असली मालिक कश्यप श्रीवास्तव को वापस लौटाने का था। पर सुखबीर को बुरी तरह से खांसता हुआ देख, उसने  सुखबीर को इसके बारे में पूछा: "क्या हुआ? इतनी जोरों से क्यों खांस रहा हैं? डॉक्टर के पास जाना हैं तो बोल..इधर पास ही में अस्पताल हैं। उधर जाते हैं ना..."

सुखबीर: "नहीं यार तू मुझे मेरे घर ले चल...और कुछ नहीं.. मैं ठीक हो जाऊंगा आराम के बाद... मुझे आराम की जरूरत हैं अभी भी..." ऐसा बोल के वो फिर से खांसने की एक्टिंग करने लगा...सुखबीर को लगा की मामला गंभीर हैं इसलिए वो बोरीवली से वापिस वसई की ओर चल पड़ा, पीछे सुखबीर को बिठा के। दोनों करीब 3:15 pm को सुखबीर गील के घर पहुंच गए। सुखबीर एकदम धड़ाम से अपने बिस्तर पर यूं गिरा जैसे एकदम बीमार हालत में पहुंच गया हो। ये देख कर रणवीर को आश्चर्य हुआ की उस रेस्टोरेंट में तो वो एकदम ताकत से उसके साथ हाथापाई करने पर उतर आया था तो अब इसे अचानक ये खांसने की बीमारी और कमजोरी कैसे हो गई? पर फिर भी ज्यादा दिमाग न लड़ाते हुवे, रणवीर उसके घर से रवाना हो गया। 

जैसे ही रणवीर  सुखबीर के घर से निकला, उसकी बहन पूनम अपने भाई को उसकी तबीयत के बारे में पूछने लगी। तो सुखबीर ने उसे डांट दिया ये बताते हुवे कि उसकी तबीयत अब बिल्कुल ही स्वस्थ हैं! पूनम को भी ये आश्चर्य हुआ की जब वो दोनों घर आए थे, तब तो सुखबीर एकदम धड़ाम से बिस्तर पर यूं गिरा था, जैसे एकदम बीमार हो गया हो...और जैसे ही रणवीर घर से बाहर गया तो सुखबीर उसे बोल रहा हैं कि वो एकदम स्वस्थ हैं! तो आखिर सच क्या हैं? क्या उसका भाई सच में बीमार हो गया हैं या फिर थोड़ी थोड़ी देर में वो बीमार होने का ढोंग कर रहा हैं? पूनम दो मिनट तो सोच में पड़ गई। "जो भी होगा, बाद में देखा जाएगा।" ये सोच कर पूनम वहां से अंदर के कमरे में चली गई। 

उधर रणवीर करीब 3:30pm को अपने घर पहुंचा। मुंह धो के वो भी 6 बजे का अलार्म लगा के सो गया, क्योंकि रात को उसकी नींद पूरी नहीं हुई थी। 

इस दौरान, इस तरफ सुखबीर जो कि बीमारी का ढोंग रचा रहा था, वो करीब 3:20 के आसपास अपने बिस्तर से खड़ा हो गया। जेब में पॉकेट डाल दिया, क्योंकि उसी में उसका आधार कार्ड की जेरॉक्स, पैसे और ड्राइविंग लाइसेंस की जेरॉक्स, सब पड़े रहते थे। चुपचाप वो दरवाजे की तरफ खिसका। चप्पल पहन ली और आहिस्ता से घर के बाहर निकल गया। उसकी बाइक को बिना चालू किए, घर से करीब 50 मीटर दूर ले गया। वहा पे उसने वो नई हीरो स्प्लेंडर बाइक स्टार्ट की और फिर डुप्लीकेट चाबी बनाने वाले की दुकान की तरफ चल दिया। 

कौशिक चौधरी नामक एक शख्स ताले चाबी बेचने का और डुप्लीकेट चाबियां बनाने का धंधा करता था। डुप्लीकेट चाबियां लोग ज्यादातर तब बनाते हैं जब एक से ज्यादा लोगों को घर के मुख्य दरवाजे को एक के बाद एक अलग अलग समय पर खोलने की आवश्यकता होती हैं। ये एक कानूनी जरूरत हैं। जब की कुछ लोगों की गैर कानूनी जरूरतें भी होती हैं! जैसे की चोरी के इरादे से किसी दोस्त की बाइक की या घर की चाबी कुछेक घंटों के लिए (दोस्त से मांग के या फिर वहां भी चुरा के) ले आना और फिर उसकी डुप्लीकेट बना के उस ओरिजिनल चाबी को दोस्त को वापस कर देना/ भिजवा देना। इसलिए चौधरी हरेक वो शख्स जो की डुप्लीकेट चाबी बनाने की ख्वाहिश ले कर उसके पास आता था, उसके इरादें को नजदीकी से भांपने की कोशिश करता था। अगर उसमें उसे कोई अनैतिकता नजर आती, तो वो तुरंत उस शख्स को नई चाबी बनाने से इनकार कर देता था। हालांकि सुखबीर को वो कई सालों से जानता था। इसलिए उसने सुखबीर के डुप्लीकेट चाबी बनाने के इरादें के ऊपर ज़रा भी संदेह नहीं किया। इसलिए उसने सुखबीर से कोई सवाल ही नहीं पूछे कि "भाई आप इसकी डुप्लीकेट चाबी क्यों बनाना चाहते हो? कोई गैरकानूनी वजह तो नहीं हैं? क्योंकि अगर हैं तो न सिर्फ तुम फंसोगे, लेकिन पुलिस मुझे भी अंदर कर देगी, क्योंकि उसे बनाने वाला और बेचने वाला कमबख्त मैं ही बनूंगा।" लेकिन ये सारे सवाल उसने सुखबीर सिंह से नहीं पुछे। आगे जा के उसे इस गलती जा एहसास होने वाला हैं, पर फिलहाल तो चौधरी सुखबीर गील को बिना कोई सवाल किए ही डुप्लीकेट चाबी बनाने को राज़ी हो गया! 

"एक चाबी का 50₹ और दो का सिर्फ 85₹ (50 x 2 = ₹100 नहीं)। बेहतर होगा कि आप एक के बदले दो बनवा ले, सुखबीर साहब!" सुखबीर ने सोचा कि अगर 1 डुप्लीकेट अगर खो गई तो वापस थोड़ी कठिनाई शुरू हो सकती हैं। इसलिए उसने चौधरी को 2 डुप्लीकेट चाबियां बनाने को बोल दिया। चौधरी राज़ी हो गया और उसने सुखबीर को अगले दिन को 7 pm (शाम के सात बजे) आ के अपनी सारी तीनों चाबियां (1 ओरिजनल और 2 डुप्लीकेट)  ले जाने को कहा। उसकी बात मान कर सुखबीर तुरंत ही वहां से निकल गया। करीब 5 मिनट में वापस वो खुद के घर के नजदीक तक पहुंच गया। वहा घर के मुख्य दरवाजे के करीब 50 मीटर दूर उसने बाइक का इंजन बंध कर दिया, जिससे बाइक के इंजन की आवाज से उसके घर के सदस्य कहीं उस जानी पहचानी आवाज से उसे ढूंढते हुवे बाहर ना आ जाए। फिर वहां से बाइक को दोनों हाथों से इंजन बंध की अवस्था में चलाते हुवे वो घर तक ले आया। बाइक को पहले से निर्धारित जगह पर पार्क कर दिया और चुपचाप घर की चाबी निकाल के बाहर से लोक किए हुवे दरवाजे को खोल के घर में प्रवेश कर लिया।वापस अपने कमरे में आहिस्ता आहिस्ता बिल्ली की तरह  चुपचाप जा के, वो अपने बिस्तर पे लेट गया। 

दो मिनट के बाद उसके नाटक का एक और प्रकरण उसने शुरू कर दिया। अब वो जोरों से खांसने लगा। उसको मालूम था की पूनम उसके खांसने की आवाज सुन कर दौड़ के आएगी। उसकी निरंतर खांसने की आवाज सुन कर पूनम उधर तुरंत आ गई। देखती हैं की उसका भाई बिस्तर पर जागी हुई अवस्था में पड़ा हुआ हैं और जोरों से उसे खांसी आ रही हैं। "भैया, मैं देख पा रही हूं की अचानक से ही आपको बहुत खासी आ रही हैं। अभी के अभी डॉक्टर के पास जाना हैं तो बोलिए।": पूनम

"ऐसा लग रहा हैं कि मुझे कोई लंग इन्फेक्शन ( फेफड़े की बीमारी) हो गई हैं। तुम मुझे डॉक्टर अमित खन्ना साब के पास शाम 5:30 को ले जाना। ठीक हैं? अभी तो मैं 5 बजे तक सो जाता हूं।" ये कहते हुवे, वह अब सो गया।  

शाम के 5:12 pm का वक्त हुआ हैं। सुखबीर अभी भी खुद के बिस्तर पर लेटा हुआ हैं। उसकी बहन पूनम अचानक से उसके कमरे में आ जाती हैं और उसे जगाने की कोशिश करती हैं। वो तुरंत उठ जाता हैं। मुंह धो के, बालों को कंगी से संवार के, अब वो बहार के होल में आ जाता है।उधर दूसरे कमरे से उसकी बहन भी तैयार हो के आ जाती हैं। दोनों घर से बाहर निकलने की तैयारी ही कर रहे होते हैं कि अचानक सुखबीर की पत्नी निराली देवी का फोन सुखबीर के मोबाइल पर आ जाता हैं। कोई खास बात नहीं। होती, बस यूं ही "कैसे हो, कैसे नहीं हो" वाली सामान्य बात होती हैं, दो मिनट के लिए। फिर उसे खत्म कर के सुखबीर और पूनम डॉक्टर अमित खन्ना के क्लिनिक के लिए निकल पड़ते हैं। 

"अब आगे जो मैं खेल खेलने जा रहा हूं उसमें इस डॉक्टर का किरदार अहम रहने वाला हैं। खास करके तब जब मुझे चोरी के इल्जाम को गलत साबित करना हो, अपने आप को लाचार और बीमार दर्शाना हो तब। इसलिए बेटे, इस डॉक्टर को तो तुम अपनी एक्टिंग से खुद के मायाजाल में बराबर फंसा ही लो, समझे?" सुखबीर अपने आप से मन ही मन बातें कर रहा हैं, ऑटो में बैठे हुवे। ऑटो उसे डॉक्टर खन्ना के क्लिनिक की चौखट पर ला कर उतार देता हैं। 

शाम 5:30 का वक्त हैं। ऑटो वाले को उसके पैसे दे कर सुखबीर और बहन पूनम, डॉक्टर खन्ना के क्लिनिक के अंदर प्रवेश करते हैं। डॉक्टर शाम 5 बजे से आ चुके हैं। वहा बहार बैठी हुई रिसेप्शनिस्ट उसका नया case दर्ज करती हैं। उनसे 250 ₹ फ़ी मांगती हैं। सुखबीर को ये पसंद नहीं आता, पर मजबूर हैं। इसलिए वो 250 की फ़ीस जमा कर के, ऊपर डॉक्टर को मिलने चले जाता हैं। उसका क्रम चौथा हैं। करीब 25 मिनट इंतजार करने के बाद, सुखबीर का क्रम डॉक्टर खन्ना से मिलने के लिए आता हैं। बाजू में अभी भी उसकी बहन पूनम बैठी हुई हैं। सुखबीर उसके कानों में कुछ फुसफुसाता हैं। यह सुन कर पूनम अब उठ के वापस नीचे ग्राउंड फ्लोर में चली जाती हैं। 

"अब आप से क्या छिपाना डॉक्टर साहब!" सुखबीर उसके मायाजाल को फैलाना शुरू कर देता हैं _ कैसे उसकी योजना कश्यप श्रीवास्तव के बंगले में चोरी करने की हैं। उसके लिए जब कभी उसके ऊपर कोई इल्ज़ाम आए तो डॉक्टर को सिर्फ ये बताना है कि ये इंसान तो बिल्कुल ही बीमार हैं, अस्वस्थ हैं। वो हर वक्त ज्यादातर उसी के अस्पताल के अंदर ठीक होने के लिए भरती रहता हैं। ऐसा आदमी भला किसी के बंगले में चोरी कैसे कर सकता है!??! वो उस डॉक्टर को इस बारे में उसकी योग्य मदद करने के बदले में रुपए 5 लाख  की धनराशि देने को तैयार है। खन्ना उसे वो रकम दुगनी यानि कि 10 लाख करने को बोलता हैं। सुखबीर राज़ी हो जाता हैं। सौदा तय होने को हैं।

On paper तो डॉक्टर खन्ना उसकी सारी बातों से सहमत हो जाते हैं, क्योंकि मामला अब बड़ी रकम का हैं। लेकिन उनकी भी कुछ शर्ते हैं: 

1) पहली शर्त ये कि वे सुखबीर को झूठी बीमारी का सर्टिफिकेट तो अवश्य देंगे परंतु उस पूरे मामले में कहीं पर भी उनका या उनके क्लिनिक का, कभी भी नाम नहीं आना चाहिए। अगर गलती से आ भी गया, तो वो उस गुनाह की सारी जिम्मेदारी खुद पर ले लेगा। डॉक्टर खन्ना और उसके क्लिनिक के ऊपर कोई बदनुमा दाग ना आए, उसकी भरपूर कोशिश वो करेगा। 

2) दूसरा की जो भी पैसा वो उन्हें देने वाला हैं वो रकम खन्ना के बैंक खाते में नहीं डालेगा। लेकिन खन्ना के एक करीबी दोस्त के बैंक खाते में डालेगा। उस खाते का नंबर खन्ना उसे सही वक्त आने पर देंगे। 

3) अगर कोई भी ऐसा संजोग पैदा हुआ कि खन्ना को कोर्ट के चक्कर काटने पड़े और कोर्ट मुंबई में ही कहीं दूर या मुंबई के बाहर हो, तो वहां तक आने जाने का, खाने पीने का और रहने का खर्चा जो भी होगा वो सुखबीर उठाएगा। रहने में वो 3 star होटल से नीचे नहीं रहेगा और खाने का उसका रोज़ का खर्चा 500 का होगा। अगर मुंबई के बाहर कहीं पे आना जाना हुआ तो वो इकोनॉमी क्लास की फ्लाइट टिकट खन्ना के लिए बुक करवाएगा, ना कि ट्रेन या बस का। 

खन्ना ने अप्रत्यक्ष रूप से सुखबीर को एक धमकी भी दे डाली, यह कह कर कि उसकी पहचान काफी ऊपर तक हैं _ पुलिस में, वकीलों में और गुंडों में। बहुत शक्तिशाली आदमी हैं वो। इसलिए बेहतर होगा कि वो कोई खिलवाड़ ना करे उनके साथ। अगर कोई गड़बड़ हुई और खन्ना को कोई आर्थिक, मानसिक या शारीरिक क्षति पहुंची, तो उसका जिम्मेदार सुखबीर खुद रहेगा, और उसकी उसे बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। 

खन्ना की तीसरी शर्त थोड़ी कठिन थी और उसके बाद जिस सुर में उसने धमकी दे डाली थी वो तो और भी कठिन थी। दो मिनट तो सुखबीर का मन करा की साले का मुंह अभी के अभी तोड़ डाले। पर उसको फिलहाल खन्ना की ज्यादा जरूरत थी, न की खन्ना को उसकी। इसलिए चुपचाप उसने हंसते हंसते सारी शर्ते मान ली। खन्ना को भी विश्वास हो गया की आदमी अच्छा हैं और काम होने के बाद में, वो उन्हें कोई धोखा नहीं देगा। इसलिए वो भी मुस्कुरा दिया और बोला: "ठीक हैं। Then, I assume we have a deal...! (मैं समझता हूं कि हमारा सौदा पक्का हुआ!)"

जवाब में सुखबीर ने भी "हां" कह कर सर हिला दिया। दोनों ने राज़ी खुशी हाथ मिलाए। सुखबीर वहा से निकल गया। 

बहन के साथ वो घर जाने के लिए ऑटो में बैठ गया। रास्ते में वो खन्ना के बारे में सोचने लगा: "ये खन्ना डॉक्टर कम और गुंडा ज्यादा हैं। ऐसे बात कर रहा था मानो मैं उसके साथ कुछ गलत करने वाला हूं। एक बार मेरे हाथ करोड़ों रुपए आ गए तो उसे उसके 10 लाख देने में मुझे क्या दिक्कत हो सकती हैं? ये पैसे उसके मुंह पे मार दूंगा। आया बड़ा धमकियां देने वाला _ पुलिस वकील और गुंडों की..अबे तेरी इन धमकियों से ये शेर डरता बरता नहीं हैं, खन्ना...ये तो अच्छा हुआ कि आगे तू कुछ नहीं बोला, वरना तेरी ऐसी हालत करता की तुझे मालूम पड़ जाता की एक सुखबीर सिंघ गील क्या चीज़ हैं।"

रास्ते में पूनम ने उसे पूछा: "भैया, तुमने मुझे वहां ऊपर, डॉक्टर की केबिन में, बाजू में बैठे रहने क्यों नहीं दिया? नीचे क्यों भेज दिया? ऐसी क्या बात हैं जो तुम मुझसे छुपाने को उतावले हो रहे थे? और डॉक्टर बाबू ने आपकी बीमारी के बारे में और दवाइयों के बारे में क्या कहा हैं?" 

सुखबीर: "बताता हूं। मैने तुम्हे इसलिए वहां से नीचे भेज दिया था कि मुझे संदेह था की मुझे शायद कैंसर जैसी कोई खतरनाक और जानलेवा बीमारी हुई हैं। अगर तुझे ये मालूम पड़ जाता तो तुझे मानसिक तौर पर धक्का लग जाता। तू ये सदमा शायद बर्दाश्त न कर सकती, मेरी बहन...बेहोश हो कर वहीं पर गिर पड़ती। ये सब ना हो इसलिए मैंने तुझे नीचे भेज दिया था। 

रहा अब तेरा दूसरा सवाल का जवाब: तो सुन, मुझे कुछ नहीं हुआ हैं, कोई बीमारी नहीं हैं मेरे नाखून तक में...ऐसा डॉक्टर ने साफ बोला हैं!😊😊

रही बात खांसी की तो वो तो ऋतु बदलाव की वजह से हुआ हैं। थोड़े दिनों में ठीक हो जाएगा। लेकिन फिर भी डॉक्टर ने इसके लिए बेनाड्रिल नाम के सिरप का सेवन करने के लिए बोला हैं मुझे, अगले 4 दिनों के लिए। मैं वो सिरप आज रात तक किसी फार्मेसी की दुकान से खरीद लूंगा। अब और कुछ?"

पूनम को अपने भैया के तीनों जवाब से काफी संतुष्टि हो गई। वो बोली: "नहीं नहीं...अब और कुछ नहीं पूछना तुम्हें...!" ये कहकर वो मुस्कुराने लगी। अब उसको लगने लगा कि भैया उससे कुछ भी छुपा नहीं रहे होते हैं। उसको भैया पर कोई संदेह नहीं करना चाहिए। ये सोचते हुवे उसने भैया के कंधे पर अपना सर रख दिया। सुखबीर ने ये महसूस किया और वो भी हल्का सा मुस्कुरा दिया। तनाव से भरी हुई जिंदगियों में दो पल के लिए मानो जैसे खुशी और शांति छा गई! अचानक नर्क जैसी जिंदगी स्वर्ग सी दिखने लगी, दोनों को!

थोड़ी ही देर में ऑटो उनके घर पे आ के रुका। सुखबीर ने उसे भाड़े की रकम दे दी। भाई बहन बड़ी शांति से घर में प्रवेश कर गए। बहन पूनम सीधे किचन में चली गई और सुखबीर स्टूल के ऊपर टांगें चढ़ा के टीवी देखने लगा। 

टीवी तो उसने चालू कर दिया था, पर उसका शातिर दिमाग कहीं ओर भाग रहा था: "जहां पर मुझे दो तीन दिनों में बड़ा हाथ मारना हैं, क्यों न मैं आज ही उस पूरे स्थान की रेकी कर लूं? काफी फायदेमंद रहेगा, चोरी करने में।" इतना सोच के वो वहां से उठ खड़ा हुआ। जेब में पैसे थे कि नहीं वो चेक किया। 

बाइक की चाबी उठाई और चिल्लाया, "पूनम, मैं बहार जा रहा हूं। एक दो घंटे में वापस आता हूं।" 

अंदर से पूनम Blinkit का पीला थैला ले कर दौड़ती हुई आई: "ये लो इसे भी ले जाओ, आपका चलता फिरता ऑफिस!😃" 

"अरे नहीं रे...इस वक्त में  डिलीवरी करने नहीं जा रहा हूं। किसी दूसरे काम से जा रहा हूं। इसकी फिलहाल कोई जरूरत नहीं पड़ेगी।" ये बोलते हुवे उसने वो थैला पूनम को वापस दे दिया और घर से बाहर निकल गया। 

पूनम को ये समझ में नहीं आया कि वो अगर Blinkit का काम करने के लिए बाहर नहीं जा रहा, तो कहा पर जा रहा हैं? "इसमें तो भैया, आपके समय और पैसे की बर्बादी होगी। ऐसा मत करो। फिर से डिलीवरी के काम पर लग जाओ अब तुम..." ऐसा मन ही मन में बोलती हुई वो फिर से अंदर के कमरे में चली गई। 


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