चाबी _ Chapter 5

आखिर वो दिन आ ही गया, जब सुखबीर ने चोरी करने का प्लान बनाया था _ रविवार का दिन, छुट्टी वाला दिन...आज कश्यप श्रीवास्तव अपने परिवार को ले कर खंडाला लोनावला जाने वाला हैं। उनकी गैर_मौजूदगी  में सुखबीर सिंघ गील उसके घर चोरी करने वाला हैं। और सुखबीर का दोस्त रणवीर भट्ट उसे उस चोरी से रोकने की कोशिश करने वाला हैं। आइए देखते हैं इन तीनों महानुभावों में से कौन सफल हो पाता हैं और कौन सफल होने के सिर्फ ख्वाब देखते रह जाता हैं!!

सुबह 4 बजते ही योगिता कश्यप श्रीवास्तव उठ खड़ी हुई। भगवान गणेश को माथा टेक कर वो सीधा किचन में गई। अचानक उसकी नजर उस खिड़की की तरफ गई जो रात को खुली रह गई थी। वो जैसे ही उसे बंध करने गई तो उसकी नजर आधे जले हुवे सिगरेट के टुकड़े की तरफ पड़ी जो नीचे घास पे पड़ा हुआ था। वो सोचने लगी: " आधा जला हुआ सिगरेट का टुकड़ा?? कौन आया होगा इस खिड़की के पास? कश्यप तो सिगरेट नहीं पीता कभी भी। शायद रामू ने फिर से सिगरेट पीना शुरू किया होगा। सुबह को पूछ लेती हूं, कार में बैठूंगी न, तब..." 

फिर वो नित्य क्रम में जुट गई। ब्रश कर लिया, वॉशरूम जा के आई, नहा भी लिया...फिर नाश्ता तैयार कर लिया: गुजराती ढोकला, थेपला, पंजाबी समोसा और तमिलनाडु वाली इडली...! उतने में सुबह के साढ़े पांच बज गए। कश्यप तो उठ चुके थे, और पिताजी भी। लेकिन दोनों बच्चे अभी भी सो रहे हैं। योगिता ने दोनों को जगाया। करीब 6:25 होते होते पूरा परिवार घर से निकल कर, उस छोटे से बगीचे में रखी हुई उनकी ब्लू मर्सिडीज तक आ गया हैं। सब तैयार हैं एक सुहाने सफर के लिए: मुंबई से लोनावला के करीब पौने दो घंटे के सफर के लिए। पिताजी अपनी लाल रंग की शर्ट में उनकी असली उम्र से 15 साल जवान लग रहे हैं। कश्यप जींस और बलू टी शर्ट में हीरो लग रहा हैं। योगिता ने भी क्वॉड रोई वेलवेट जींस पहन रखी हैं और ऊपर येलो टी शर्ट पहन लिया हैं। काफी खूबसूरत लग रही हैं। दोनों बच्चों ने भी अच्छे कपड़े पहने हैं। एक मस्त पिकनिक वाला माहौल बन गया हैं!

तभी अचानक योगिता को वो आधा जला हुआ सिगरेट का टुकड़ा याद आया। उसने रामू को बुलाया और वो टुकड़ा दिखाया: "रामू, ये सिगरेट का टुकड़ा तुम्हारा हैं ना? मेरे मना करने पर भी तू फिर से सिगरेट पी रहा हैं? वो भी इस घर की सीमाओं के अंदर?" 

"अरे नहीं, मेमशोब! मैंने सिगरेट नहीं पी हैं। सच बोलूं तो सिगरेट पीना मैंने पिछले 6 महीनों से छोड़ दिया हैं। ये टुकड़ा आप को कहा से मिला?"

"मुझे वो किचन की खिड़की के बहार जो घास बिछी हैं वहां पर पड़ा हुआ मिला...अगर तुमने नहीं पी ये सिगरेट तो फिर ये टुकड़ा यहां पर आया कैसे? मेरे घर में कोई नहीं पीता हैं इसे _ न ही कश्यप, न पिताजी, न मैं। तो फिर ये इधर आया कैसे? बोलो रामू भैया? जवाब दो मुझे...😡" 

मालकिन का गुस्सा देख कर रामू थरथर कांपने लगा: "मालूम नहीं मेमसाब...ये इधर कैसे आ गया... मैं ध्यान रखूंगा कि ऐसी गलती मुझसे दोबारा न हो...माफ कर दो इस बार...🙏🏻"

"ठीक हैं अगली बार ध्यान रखना..." ऐसा बोल के योगिता गाड़ी में बैठ गई। बैठते बैठते बोली : "कश्यप, तुम ये दोनों निकम्मे CCTV कैमरों को कब replace करने वाले हो (बदलने वाले हो) ? काम तो ये करते नहीं, फिर इनको निकाल दो और उनकी जगह दो नए  कैमरे लगवा दो न? कितनी बार बोलूंगी जानू, मैं तुम्हे इसके बारे में?" 

कश्यप: "Honey, कुछ ज्यादा ही काम में बिजी रहता हूं आजकल, इसलिए ये नहीं कर पाया था। पर खंडाला से लौटते ही सबसे पहले करवा दूंगा...I will do it on a priority basis! (मैं इस काम को प्राथमिकता दे कर करवा लूंगा)"

उतनी बात हुई न हुई की कश्यप ने मर्सिडीज को चालू कर दिया। पूरा श्रीवास्तव खानदान सुबह के 6:40 को अपने घर से खंडाला लोनावला के लिए निकल पड़ा हैं!

मुंबई से निकलनें में ही कश्यप को करीब पौना घंटा लग गया। "इतने सारे ओवरब्रिज बन जाने के बाद भी मुंबई शहर का ट्रैफिक फिर से बहुत बढ़ गया हैं। जब तक इस देश की आबादी के ऊपर काबू नहीं पाया जाता, ये ट्रैफिक की समस्या तो, लगता हैं, ज्यों की त्यों रहेगी। इसका फिलहाल तो कोई इलाज ही नजर नहीं आता।": कश्यप मन ही मन सोच में पड़ जाता हैं। 

लोनावला पहुंचने में श्रीवास्तव परिवार को ज्यादा समय लग रहा हैं क्योंकि बीच में वो लोग 2 जगह रुकते हैं: पहले फ्रेश होने के लिए, और फिर दूसरी बात 30 मिनट वो लोग सुबह का नाश्ता एक अच्छे से ढाबे में करते हैं। बीच में खूबसूरत नजारे आते हैं तो कश्यप गाड़ी को रस्ते के बगल में पार्क कर देता हैं, उन नजारों को देखने के लिए। बच्चों को तो इसी में बहुत मज़ा आ रहा हैं। ऐसा करते करते करीब 3 घंटे में वो लोग लोनावला पहुंचते हैं। 

सुबह के 9:45 का वक्त हुआ हैं। कश्यप श्रीवास्तव परिवार समेत लोनावला में प्रवेश कर चुका हैं। एक पंच सितारा "होटल हिल व्यू" में वो लोग चेक इन करते हैं। सारा सामान उधर रख के वो लोनावला की हसीन वादियों को देखने के लिए निकल पड़ते हैं। 

कश्यप को लोकल गाइड की जरूरत नहीं हैं क्योंकि सब कुछ गूगल में बड़ी सफाई से दिया हुआ हैं _ नक्शे, अच्छी जगहों में क्या क्या देखने लायक हैं, सस्ती और अच्छी चीजें किधर मिल सकती हैं, मार्केट में से क्या क्या शॉपिंग करने जैसा हैं, इत्यादि। योगिता इसमें काफी निष्णात हो चुकी हैं, तो कश्यप उसी से सारी जानकारी ले लेता हैं। अब वो ही सब की गाइड बन चुकी हैं! "आज पूरा दिन घूमेंगे और फिर देर रात को होटल लौटेंगे..": योगिता सोच रही हैं। 

कश्यप सब से पहले Dela एडवेंचर पार्क के लिए गाड़ी को ले जाता हैं। उसे मालूम हैं कि वो जगह बच्चों को बहुत पसंद आएगी। उसके बाद उनका लोहागढ़ किल्ला और राजमाची किल्ला जाने का इरादा हैं, जो कि ऐतिहासिक जगहें हैं। 

इस तरफ मुंबई शहर में सुखबीर रोज़ की तरह सुबह 4 बजे आज नहीं उठा। वो अभी भी सो रहा हैं, सुबह 10 बजे भी! पूनम ने जब उसे उठाने की कोशिश की तो उसने बुखार का बहाना बना दिया और फिर से सो गया। पूनम का शक़ और गहरा हो रहा हैं: "शायद भाई को बुखार नहीं हैं। उनके दिमाग में कुछ और ही चल रहा हैं, शायद...देखती हूं वो आगे क्या करने जा रहे हैं..." सुखबीर के पिता को मालूम नहीं हैं कि सुखबीर अभी भी घर पे ही हैं। वो अपनी निवृत दुनिया में खोए हुवे, अखबार पढ़ रहे हैं। 

सुखबीर दोपहर 12 बजे उठता हैं। खाना खा के वो 1 बजे फिर से एक आखिरी बार रेकी करने हेतु बोरीवली वेस्ट को रवाना होता हैं। करीब 2:20 को वो बोरीवली वेस्ट में स्थित कश्यप श्रीवास्तव के घर पहुंच जाता हैं। बाहर वॉचमैन रामू बैठा बैठा उसके मोबाइल पर कुछ कर रहा हैं। सुखबीर बाइक को सामने आए पानवाले की दुकान के आगे खड़ी करता हैं। 

पानवाला उत्तर प्रदेश के बरेली से हैं। उसका नाम लखन यादव हैं। वो इस जगह पर पिछले 4 साल से छोटी सी दुकान चला रहा हैं, जिसमें वो पान, बीड़ी, सिगरेट, पानी की बोतल, इत्यादि बेचता हैं। सुखबीर को मालूम हैं कि ये बंदा कश्यप और उसके घर के बारे में काफी कुछ जानता होगा। पर अगर ज्यादा पूछना शुरू किया तो उसे शक़ भी हो सकता हैं। इसलिए सुखबीर बड़ी चालाकी से काम लेता हैं। पहले तो वो अपनी मनपसंद Bristol सिगरेट मांगता हैं। फिर आहिस्ता से बात शुरू करता हैं:

"क्या हाल हैं, जी?": मुस्कुरा के सुखबीर पूछता हैं। 

"बहुत बढ़िया हैं, भैया...! आप कैसे हो?": पानवाला तुरंत  पहचान लेता हैं कि ये वो ही बंदा हैं जो कि कल भी आया था, Bristol खरीदने के लिए। 

"मैं भी बढ़िया हूं...": सुखबीर "ये सामने वाला "महावीर" मकान जो हैं, उसमें कौन रहता हैं जी? मुझे वाटर प्यूरीफायर मशीन बेचना हैं इसलिए पूछ रहा हूं..."

पानवाला तिवारी: "वो तो मैं समझ गया, साब... देखिए उसमें रहते हैं श्रीमान मंगल वर्मा, हमारे यूपी के ही हैं, लखनौ से हैं वो...काफी अमीर लोग हैं वो...कुछ फैक्टरियां हैं उनकी ..." 

सुखबीर: "समझ गया...और ये जो सफेद मकान जो हैं श्रीवास्तव जी का, उसमें आप बोल रहे हैं कि CCTV कैमरे तो दो दो हैं, लेकिन काम एक भी नहीं कर रहा हैं?" अब सुखबीर मुद्दे पर आ गया। "अच्छा, वो मैं रिपेयर कर सकता हूं। चलो अभी जा के उन्हीं से पूछ लेता हूं..." 

"अरे साब वो लोग तो आज सुबह से ही कहीं घूमने गए हुवे हैं, उनके चौकीदार रामू ने बताया मुझे 11 बजे...जब वो इधर गुटखा खाने को आया था तब...": पानवाला: "अरे हां याद आया...उसने कहा था कि वो लोग खंडाला गए हुवे हैं, घूमने के लिए...2 दिन के लिए...अभी उनके बंगले में कोई नहीं हैं वैसे..सिर्फ रामू चौकीदार हैं...तो आप उनसे तो 2 दिन बाद ही बात कर सकते हो..."

"ठीक हैं, समझ गया..तो अभी वर्मा जी को मिल लेता हूं, और क्या..": सुखबीर: "वैसे आपने जो जानकारी दी, उसके लिए बहुत धन्यवाद आपका..." ऐसा कह कर वो वर्मा जी के घर की ओर जाने का ढोंग करता हैं, जिससे कि तिवारी को लगे की वो सचमुच कोई सेल्स मेन ही हैं, जो की वहां पे कुछ सामान बेचने के लिए आया हुआ हैं। इससे उसे कोई शक़ न होगा। 

वर्मा जी के घर तक तो वो जाता हैं, लेकिन फिर उनकी डोर बेल दबाने का सिर्फ दिखावा करता हैं। फिर पीछे मुड़ के देखता हैं कि तिवारी उसको देख रहा हैं या नहीं। तिवारी देख नहीं रहा, इसलिए वो वही से लौट आता हैं। 

फिर वो कश्यप श्रीवास्तव के घर की तरफ मुड़ता हैं। उनका चौकीदार रामू अभी भी मोबाइल में व्यस्त हैं। वो उतना ज्यादा व्यस्त हैं कि अगर कोई आहिस्ता से मकान के अंदर भी घुस जाए, उसे पता भी नहीं चलेगा!😀 अपना चौकीदारी का धर्म वो भूल रहा हैं। सुखबीर वहा से फिर लौट के पानवाले तिवारी की दुकान की तरफ मुड़ता हैं। उसे अब यकीन हो चुका हैं कि इस चौकीदार से निपटना कोई मुश्किल बात नहीं लग रही, क्योंकि वो सुखबीर को, अपनी ही दुनिया में खोया रहने वाला, अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ने वाला, बेफिकरा इंसान दिखाई देता हैं। 

"अगर इसे मैं शराब के नशे में डूबो दूं तो ये पूरी रात किसी भैंस की तरह सो जाएगा...और मैं आराम से पूरे घर को लूट सकता हूं सुबह तक...": सुखबीर को ये ही प्लान अच्छा लगता हैं। इसलिए वो तरकीब सोच लेता हैं : "ये पानवाला तिवारी तो वैसे भी दोस्त बन ही चुका हैं। रात होते होते चौकीदार रामू को भी दोस्त बना लूंगा। फिर दोनों को एकदम ज्यादा दारू पिला के पूरी रात घर में से सारी कीमत चीजें निकाल लूंगा..." 

थोड़ी देर के लिए वो उस दिशा में चलने लगता हैं, जहां पर न तो श्रीवास्तव का न ही वर्मा का घर पड़ता हैं, यानि कि पूर्व दिशा में। चलते चलते उसका ध्यान एक भिखारी की तरफ पड़ता हैं। वो उसे घूर घूर के देख रहा हैं। श्रीवास्तव के घर से करीब 40 गज की दूरी पर स्थित वो उधर फुटपाथ पे बैठ कर रोज बैठे बैठे भीख मांगता हैं, इसलिए वो करीब करीब सब को जानता हैं, पहचानता हैं। उसके दोनों पांव कटे हुवे हैं, लेकिन दोनों हाथ सलामत हैं। इकबाल नाम हैं उसका। भिखारी होने के बावजूद वो काफी शातिर किस्म का इंसान हैं। आसपास की हर चीज पर उसकी पैनी नजर रहती हैं। उसकी आदत से उसे अब तक तो फायदा ही हुआ हैं, इसलिए अब वो उस पूरे इलाके के जागीरदार की तरह बर्ताव करता हैं! किसी अंजान व्यक्ति को देख कर, उसे घूरने लगता हैं! मानो पूछ रहा हो: "अबे ओ, कौन हैं तू? यहां पे मेरे इलाके में क्या कर रहा हैं?" 

सुखबीर को भी उसी पूछताछ वाले अंदाज में इकबाल घूरने लगा तो तुरंत सुखबीर को खयाल आ गया कि इस भिखारी जैसे दिखने वाले इंसान के दिमाग में कुछ चल तो रहा हैं। इसलिए चालाकी से वो उस को एक मुस्कान दे देता हैं और उसके हाथ में 5 का सिक्का दे देता हैं। इकबाल वो सिक्का तो ले लेता हैं, मगर उसे जवाबी मुस्कान नहीं देता। अभी अभी वो सुखबीर को घूरना चालू ही रखता हैं! सुखबीर वैसे काफी बुद्धिशाली इंसान हैं। उसे मालूम पड़ जाता है कि उस भिखारी को अब ज्यादा भाव देने की जरूरत नहीं हैं, वो ऐसे ही ज्यादा फुटेज खा रहा हैं। इसलिए उसका ध्यान वहां से हटा के वो सीधे सीधे चलने लगता हैं। इकबाल भी अब दूसरी ओर देखने लगता हैं। 

कुछ 500 कदम आगे जा के सुखबीर वहा से लौटता हैं। फिर वो तिवारी पान वाले की दुकान पर पहुंचने को अग्रसर हैं। उसने तय कर लिया हैं कि कैसे भी कर के वो आज शाम तक तिवारी और रामू से दोस्ती कर ही लेगा। जब वो वापस तिवारी की दुकान तक पहुंचता हैं तो उसे खयाल आता हैं कि उस फुटपाथ पर बैठा हुआ वो भिखारी वो उसे फिर से घूर रहा हैं। वो उस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं देता क्योंकि उसे लगता हैं कि वो भिखारी उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता। इसलिए वो आगे चलते हुवे तिवारी की दुकान तक पहुंचता हैं। अचानक उसकी नजर रामू के ऊपर पड़ती हैं जो कि उसी दुकान की ओर, श्रीवास्तव के बंगले की तरफ से आ रहा हैं। 

"अरे तिवारी भाई, एक बात बताता हूं आपको.. आज मेरे स्वर्गीय दादा का जन्मदिन हैं। मेरे लिए वो बहुत ही प्रिय इंसान थे। तो मैंने आज रात को एक छोटी सी पार्टी रखी हैं। आप भी आइएगा उधर आज रात 10 बजे!": सुखबीर

"क्या बात हैं! अभी तो हम दोनों की पहचान हुवे सिर्फ 2 दिन हुवे हैं और आप हमें पार्टी में बुला रहे हो?? वाह, इसे बोलते हैं "बड़े दिल वाला"...मैं तो जरूर आऊंगा उस पार्टी में भैया...": पानवाला तिवारी 

"अरे भाई कौन सी पार्टी की बात हो रही हैं?" बीच में चौकीदार रामू टूट पड़ा..."मैं भी तो सुनूं..?"

"कुछ नहीं, ये जो हमारे दोस्त हैं सुखबीर भाई bristol पीने वाले हमारे ग्राहक...वो आज कुछ पार्टी रखे हुवे हैं यही कहीं पास के रेस्टोरेंट में..तो हम को बुलाए तो हम ने "हां" बोल दिया उनको, बहादुर...": तिवारी: "अरे सुखबीर भैया, इनको भी बुला लो अगर हो सके तो, रामू को भी...?" 

"पर तिवारी जी, ये हैं कौन? ऐसे ही कैसे बुला ले? पहचान तो करवाईये..!": सुखबीर

"सामने जो बड़ा सा सफेद बंगला हैं, श्रीवास्तव जी का, ये वहा के वॉचमेन हैं, चौकीदार रामसिंघ बहादुर...पूरे बंगले की रखवाली करते हैं ये सुबह शाम...": तिवारी

मुफ्त में भोजन की पार्टी मिलता हुआ देख, रामू भी मुस्कुरा देता हैं, सुखबीर के सामने। "शोबजी, कैसे हो आप?" 

"ठीक हूं, मैं..": सुखबीर : "तो आप उस पूरे बंगले की देखरेख कर रहे हो?" 

"जी, जी, जी...": नेपाली रामू: "मैं रामू बहादुर हूं। और आपका नाम शोबजी?" 

"नाम जान कर क्या करोगे?": सुखबीर: "अब देख लो ना, तिवारीभाई की वजह से आपकी तो पार्टी पक्की हो गई ना?"🙂

"जी शोब...बहुत धन्यवाद करते हैं...🙏🏻...वैसे ये पार्टी किधर रखे हो?": रामू

"कुलदीप रेस्टोरेंट में...रात के 10 बजे... पहले खाना खाएंगे सब दोस्त लोग, फिर जिसे आइसक्रीम खाना हो वो आइसक्रीम खाएगा और जिसे दारू पीना हो वो दारू पीएगा...क्यों तिवारीजी, आप दारू पियेंगे या आइसक्रीम खाएंगे?": सुखबीर

"हम तो दारू पियेंगे भाई, जो भी मिलेगा वो व्हिस्की, वाइन, रम, बियर वगैरह...लेकिन आयेंगे 11 बजे...ये दुकान बंध कर के...": तिवारी

"ठीक हैं, और तुम बहादुर?!": सुखबीर

"शोबजी, हम भी दारू ही पीएगा...": रामू

"और मैं भी...खूब गुजरेगी जब तीन यार, मिलके पियेंगे पेग चार....!": ये कह कर सुखबीर अपना दाहिना हाथ हवा में यू हिलाता हैं जैसे कि उसमें एक दारू से भरा हुआ प्याला हो, और वो उसे हिलाता हो.....😀😀

उसकी इस हंसी पर तिवारी और रामू दोनों को भी हँसी आ गई..😀.."क्या बात हैं शोबजी, आप तो शायर निकले...!!"

"हां, मैं शायर तो हूं...!": सुखबीर

"शोबजी, क्या ऐसा नहीं हो सकता की होटल की बजाय मेरे  मालिक के बंगले पर ही वो पार्टी रखे? पहले खाना खाएंगे फिर दारू पियेंगे...!?": रामू

सुखबीर को  एक हसीन मौका खुद सामने चल कर उसके हाथ में आता हुआ दिखाई दिया! उसने तुरंत हां बोल दिया..."ठीक हैं..जैसा तुम कहो, रामू, मेरे दोस्त!"

मुफ्त का खाना खाने की लालच इतनी प्रबल होती हैं कई लोगों में की वो आगे पीछे का कुछ नहीं सोचते! बस, खाने के लिए तुरंत राज़ी हो जाते हैं। तिवारी और रामू को ये खयाल तक नहीं आया कि "एक अंजान इंसान, जिसके साथ पहचान तो सिर्फ अभी अभी हुई हैं, वो भला किसी महंगे रेस्टोरेंट में हमे क्यों खाना खिलाएगा, दारू भी पिलाएगा?" ऐसा विचार आना चाहिए था उनको, पर आया ही नहीं। उनको तो अभी से, खुद की नजरों के सामने, चिकन बिरयानी दिखने लगी थी, अंग्रेजी शराब की बोतले दिख रही थी!! सुखबीर को ये पता चल चुका था कि दोनों के मन में वो एक दोस्त जैसा भाव जगाने में कामयाब रहा था। यानि कि दोनों को अब विश्वास हो गया था कि ये बंदा, सुखबीर सिंघ, उनको कभी धोखा नहीं देगा!! कई बार ज्यादा विश्वास कर लेने में इंसान मूर्खता का परिचय दे देता हैं और इन दोनों ने भी अपना परिचय एक मूर्ख का ही दे दिया था! सुखबीर को बस ये ही चाहिए था कि दोनों उस पर पूरा विश्वास करने लगे, ऐसे जैसे तीनों एक दूसरे को सदियों से पहचानते हो। ठीक ऐसे ही सब हो रहा था! 

"चिकन बिरयानी नहीं होगी तो कुछ ओर मंगवा लेंगे...चलेगा ना भाई लोग?": सुखबीर

"अरे, चलेगा नहीं दौड़ेगा...दोस्त! अब तुम पर पूरा भरोसा बैठ गया हैं कि तुम जो भी करोगे वो ठीक ही करोगे.." रामू  बोल पड़ा। 

"ठीक हैं दोस्तों, तो मिलते हैं रात 10:30 बजे, इधर ही, तिवारी की दुकान पर!": सुखबीर ये बोल के बाइक को किक लगा के घर की ओर चल देता हैं। तिवारी और रामू उसको हाथ हिलाते हुवे अपने अपने कामों में वापस जुट जाते हैं। 

सुखबीर दोपहर के 3:45 को तिवारी की दुकान से निकला हैं। लंबा 80 मिनट का रास्ता हैं बोरीवली से उसके घर वसई तक का। बाइक चलाते हुवे सोचता हैं: "यार मज़ा आ गया आज तो...सब कुछ मानो सेट हो गया...! Yes, yes, yes...रामू भी आ गया जैसे अपनी मुठ्ठी में...अब रात को खाना खिला के इतनी दारू पिलाऊंगा न दोनों को, की सुबह तक उठ ही नहीं पाएंगे...फिर पूरी रात मेरी और श्रीवास्तव के घर का माल भी मेरा!!!" ये सोचते सोचते वो एकदम खुश हो जाता हैं अब तो...पर फिर अपने आप पर काबू पा कर वो सम्भल कर अपनी स्प्लेंडर में घर तक पहुंच जाता हैं। 

जब वो घर पहुंचता हैं तो शाम के 5:11 बजे हुवे हैं। वो थक गया हैं इसलिए सोने चले जाता हैं। पूनम कुछ पूछना चाहती हैं पर जब वो भैया के कमरे में आती हैं तब तक सुखबीर सो चुका होता हैं। इसलिए वो खुद के कमरे में चली जाती हैं।



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